Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 25–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, verses 25–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
ज्ञप्तिरुवाच ।
सुते वद कथं प्राप्ता त्वमिमं देशमादितः ।
किं वृत्तं ते त्वया दृष्टं किमिवाध्वनि कुत्र वा ॥ २५ ॥
विदूरथलीलोवाच ।
देवि तस्मिन्प्रदेशे सा जातमूर्च्छा तदाभवम् ।
द्वितीयेन्दोः कलेवाहं कल्पान्तज्वालया हता ॥ २६ ॥
न चेतितं मया किंचित्समं विषममेव च ।
ततस्तरलपक्ष्मान्ते विनिमील्य विलोचने ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीसरस्वती देवी ने कहा : हे पुत्रि, पहले
से आरम्भ कर तुम यह बताओ कि तुम यहाँ कैसे आई, रास्ते में कहाँ पर क्या आश्चर्यकारी
घटना घटी और तुमने क्या देखा ? विदूरथ की लीला ने कहा : हे देवि, उस समय विदूरथ
के गृहप्रदेश में कल्पान्त की ज्वाला से मुर्छित द्वितीया तिथि की चन्द्रकला के समान मैं मूर्च्छित
हो गई तदनन्तर चंचल नेत्रपलकवाले नेत्रों को बन्दकर मूर्छा में पड़ी हुई मुझको भला या
बुरा कुछ भी ज्ञात नहीं हुआ