Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 12–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 12-14
संस्कृत श्लोक
स्ववासनानुसारेण सर्वः सर्वं हि पश्यति ।
दृष्टान्तोऽत्राविसंवादी बालवेतालदर्शनम् ॥ १२ ॥
आतिवाहिकदेहासि संपन्ना सिद्धसुन्दरि ।
विस्मृतस्त्वेव देहोऽसौ प्राक्तनोऽनपवासनः ॥ १३ ॥
रूढातिवाहिकदृशः प्रशाम्यत्याधिभौतिकः ।
बुधस्य दृश्यमानोऽपि शरन्मेघ इवाम्बरे ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि मुझे उस देह की वासना थी, तो राजा की नाई मुझे वही देह क्यो नहीं मिला ? इस पर
कहती हैं।
सब लोग अपनी वासना के अनुसार ही सब पदार्थों को देखते हैं, इस विषय में बालक
का वेतालदर्शन अनुरूप दृष्टान्त है, जैसे अपनी वासनाके अनुसार स्तम्भ आदि में बालक
को वेताल की भ्रान्ति होती है, वैसे ही तुम्हें अपनी वासनाके अनुसार यह शरीर प्राप्त हुआ
है और राजा को अपनी वासना के अनुसार वही शरीर मिला। हे सिद्धसुन्दरी, इसमें कारण
यह है कि तुम आतिवाहिक देहवाली हो गई हो । पूर्वजन्म के देह को तो तुम भूल चुकी हो,
अतएव उस पर तुम्हारी वासना नहीं रही । जिस ज्ञानी पुरूष की आतिवाहिक दृष्टि बद्धमूल
हो जाती है, दूसरों को आधिभौतिकरूप से दिखाई देता हुआ भी उसका शरीर आकाश में
शरत्काल के मेघ की नाई शान्त हो जाता है