Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 34–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, verses 34–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 34-37
संस्कृत श्लोक
ज्ञप्तिरुवाच ।
हे हंसहारिगामिन्यौ लीले ललितलोचने ।
उत्थापयामो नृपतिं शवतल्पतलादिमम् ॥ ३४ ॥
इत्युक्त्वा मुमुचे जीवमामोदमिव पद्मिनी ।
ससमीरलताकारस्तन्नासानिकटं ययौ ॥ ३५ ॥
घ्राणकोशं विवेशान्तर्वंशरन्ध्रमिवानिलः ।
स्ववासनाशतान्यन्तर्दधदब्धिर्मणीनिव ॥ ३६ ॥
अन्तस्थजीवं वदनं तस्य तत्कान्तिमाययौ ।
पद्मस्यावग्रहे पद्मं सुवृष्ट इव वारिणि ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त मैंने इस महल
को देखा जो नायक (शवरूप राजा पद्म) से अलंकृत था, इसमें दीपक जलते थे, बड़ा स्वच्छ
और बहुमूल्य शयन से युक्त था, जब मैं इस पति को देखने लगी तो क्या देखती हूँ कि यह
विदूरथ फूलों से आच्छादित होकर फूलों के वनमें वसन्त के समान सोता है। मैंने सोचा
अधिक संग्राम करने से उत्पन्न परिश्रम से यह खिन्न है, अत: यह गाढ नींद में सोता है,
इसलिए उसकी इस निद्रा में मैने विघ्न नहीं डाला यानी इसे नही जगाया । इसके बाद ही
इस भूमि में आप दोनों देवियों का शुभागमन हुआ इत्यादि जैसा मेंने अनुभव किया था, हे
कृपाकारिणि, वैसा ही आपसे कह दिया है ॥३०-३ ३॥ श्रीसरस्वती देवीजी ने कहा : हे हंस
के समान गमनवाली और सुन्दर लोचनवाली दोनों लीलाओं, हम शवशय्या से इस राजा
को उठावें, ऐसा कहकर सरस्वती देवी ने जैसे कमलिनी सुगन्धि छोड़ती है वैसे ही पूर्व संकल्प
से रोके हुए राजा के जीव को छोड़ा । वायु के सदूश आकारवाला जीव उसकी नासिका के
निकट गया जैसे वायु बाँस के छेद में प्रवेश करता है, वैसे ही उसने नासिकारन्ध्र में प्रवेश
किया । जैसे सागर अपने अन्दर अनन्त मणियों को धारण करता है, वैसे ही अनन्त वासनाओं
को वह धारण करता था। जैसे अनावृष्टि होने पर मुर्माया हुआ कमल अच्छी जलवृष्टि
होने पर मनोहर कान्ति से युक्त हो जाता है, वैसे ही जीव के अन्दर जानेपर पद्म का पहले
मुरझाया हुआ मुख कान्तियुक्त हो गया