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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 50–53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, verses 50–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 50-53

संस्कृत श्लोक

इत्याकर्ण्य समुत्थाय राजा राजीवलोचनः । लम्बमाल्याम्बरधरः पपात ज्ञप्तिपादयोः ॥ ५० ॥ सरस्वति नमस्तुभ्यं देवि सर्वहितप्रदे । प्रयच्छ वरदे मेधां दीर्घमायुर्धनानि च ॥ ५१ ॥ इत्युक्तवन्तं हस्तेन पस्पर्श ज्ञप्तिदेवता । सरस्वत्युवाच । त्वं पुत्राभिमतार्थाढ्यो भवेति भवनान्वितः ॥ ५२ ॥ सर्वापदः सकलदुष्कृतदृष्टयश्च गच्छन्तु वः शममनन्तसुखानि सम्यक् । आयान्तु नित्यमुदिता जनता भवन्तु राष्ट्रेस्थिराश्च विलसन्तु सदैव लक्ष्म्यः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

कमल के तुल्य विशाल नेत्रवाला राजा यह सुनकर उठकर देवी के चरणों में गिर पड़ा । उसके वस्त्र और मालाएँ लटक रही थी, हे देवि, हे सबका कल्याण करनेवाली देवी, सरस्वतीजी आपको नमस्कार है, हे वरदायिनी, बुद्धि दीजिये, दीर्घ आयु दीजिये ओर धन दीजिये । राजा के यह कह चुकने पर देवी सरस्वतीने अपने हाथ से उसका स्पर्श किया। श्री सरस्वतीजी ने कहा : हे पुत्र, दीर्घायु, धन आदि ईच्छित पदार्थो से खूब सम्पन्न हो ओ । तत्त्वबुद्धि से प्राप्त अपने पारमार्थिक स्वरूप स्थिति से युक्त होओ । सम्पूर्ण आपत्तियाँ और समस्त पापबुद्धियाँ विनाश को प्राप्त हों, अनन्त सुख तुम्हें प्राप्त हों, तुम्हारे राज्य में सम्पूर्ण जनता सदा आनन्दित रहे ओर सकल सम्पत्तिर्यौ स्थिर होकर सदा विलास करे