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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

हेतिप्रवाहा ज्वलनं नभस्यन्त्यां विशन्त्यहो । वडवानलमुज्वालमर्णःपूरा इवार्णवात् ॥ ३७ ॥ धूमायन्ति महाभ्राणि ज्वालाः शिखरिकोटिषु । सरसान्यपि शुष्यन्ति हृदयानीव रागिणाम् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे समुद्र से जलप्रवाह खूब धधकती हुई ज्वालाओं से युक्त बड़वानल में प्रवेश करते हैं, वैसे ही मारे भय के आकाशमें उड़ने की इच्छा करनेवाली नगरी में शस्त्रास्त्रों की वृष्टियाँ प्रवेश कर रही हैं