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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीसरस्वत्युवाच । अस्मिन् रणवरे राजन्मर्तव्यं भवताधुना । प्राप्तव्यं प्राक्तनं राज्यं सर्वं प्रत्यक्षमेव ते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीसरस्वतीजी ने कहा : हे पूर्वजन्म के मण्डलपति, आइये ओर लीला की भक्ति ओर भाग्य के अनुरूप पदार्थो की समृद्धि से अत्यन्त मनोहर राज्य का आप निशंक होकर भोग कीजिये । हम लोगों ने कभी भी याचको की अभिलाषा का प्रत्याख्यान नहीं किया ओर न किरी ने उसे देखा ही है ॥ ३ ४॥ बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतालीसवाँ सर्ग अभीष्ट वरदान, राजधानी पर शत्रुपक्ष का आक्रमण और नगरदाह तथा जल रहे नगरवासियों की विविध चेष्टाओं का वर्णन । राजा द्वारा जिज्ञासित भावी बात को भी स्पष्ट कह रही देवी सरस्वती ने अवशिष्ट वरदान देने के लिए कहा । श्रीसरस्वती जी ने कहा : राजन्‌, इस समय इस भीषण रण में आपको अवश्य मरना होगा ओर पूर्वजन्म का राज्य आपको मिलेगा, यह सब तुम्हें प्रत्यक्ष ही होगा