Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अन्यैव गतिरश्वस्य गतिरन्या खरोष्ट्रयोः ।
मदस्विन्नकपोलस्य गतिरन्यैव दन्तिनः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अश्व आदि की गति के समान देशदैर्ध्य की अपेक्षा नहीं होती, इस आशय से देवीजी
कहती हैं।
यह आतिवाहिक देह की गति मनोरथ की गति के सदृश मण्डप के अन्दर संवृत
आकाश में भी सुदूर सी हो सकती है । घोडे की गति अन्य प्रकार की हे, गधे ओर ऊँट
की गति दूसरे प्रकार की है, जिसके गण्डस्थल से मदधारा बह रही हो ऐसे मदोन्मत्त हाथी
की गति दूसरे ही प्रकार की है भाव यह किं आतिवाहिक देह की गति मनोरथ की गति
की नाई दूर देश में भी ओर अदूर देश में भी अदृश्य हे । अश्व आदि की गति वैसी नहीं है,
क्योकि अश्व आदि स्थूल ओर परिच्छिन्न हैं