Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 49–61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, verses 49–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 49-61
संस्कृत श्लोक
करी रभसनिर्लूनज्वलदङ्गारपादपः ।
प्लुष्टपुष्करकः कोपान्मग्नः पुष्करदं सरः ॥ ४९ ॥
धूमोऽम्बुदपदं प्राप्य विलोलान्तस्तडिल्लतः ।
ज्वलदङ्गारनाराचनिकरं परिवर्षति ॥ ५० ॥
देव धूमस्फुरद्वह्निकण आवर्तवृत्तिमान् ।
स्थित आपीडवात्तव्योम्नि रत्नपूर्ण इवार्णवः ॥ ५१ ॥
गौरमम्बरमाभाति ज्वालाशिखरतेजसा ।
मृत्युनेवोत्सवे दत्तः कुङ्कुमाक्तकरण्डकः ॥ ५२ ॥
अहो नु विषमं चेदं वर्तते वृत्तवर्जितम् ।
ध्रियन्ते राजनार्योऽपि वैरिवीरैरुदायुधैः ॥ ५३ ॥
लोलस्रग्दामकुसुमैर्मार्गप्राकारकारकैः ।
अर्धनिर्दग्धकबरीकीर्णवक्षस्थलस्तनाः ॥ ५४ ॥
आलोलाम्बरसंलक्ष्यनितम्बजघनस्थलाः ।
पतन्माणिक्यवलयवलितावनिमण्डलाः ॥ ५५ ॥
छिन्नहारलताजालविकीर्णामलमौक्तिकाः ।
दृष्टादृष्टस्तनश्रेणीपार्श्वोद्यत्कनकप्रभाः ॥ ५६ ॥
कुररीकर्कशाक्रन्दमन्दीकृतरणारवाः ।
धारावाहास्रुतारावभिन्नपार्श्वविचेतनाः ॥ ५७ ॥
रक्तकर्दमवाष्पाम्बुक्लिन्नग्रन्धितवाससः ।
भुजमूलार्पितभुजैर्नीयमाना बलान्नृभिः ॥ ५८ ॥
क इवास्मिन्परित्राता स्यादित्यादीनवीक्षितैः ।
उत्पलालीव वर्षद्भिः परिरोदितसैनिकाः ॥ ५९ ॥
मृणालकोमलाच्छोरुमूलजालैः सुनिर्मलैः ।
स्वच्छाम्बरतलालक्ष्यैराकाशनलिनीनिभाः ॥ ६० ॥
आलोलमाल्यवसनाभरणाङ्गरागा बाष्पाकुलाततचलालकवल्लरीकाः ।
आनन्दमन्दरनिरन्तरमथ्यमानात्कामार्णवात्समुदिता इव राजलक्ष्म्यः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
युक्त है, अधजला केशभार इनके वक्षस्थल ओर स्तनमण्डल पर बिखरा है । वायु के कारण
फरफरा रहे वस्त्र से इनकी कमर ओर जंघाएँ कुछ खुली दीख रही हैँ, गिर रहे माणिक्यजडित
कड़ोंसे इन्होंने पृथिवीमण्डल को आच्छन्न कर दिया है । इनके टूटे हुए हारों से निर्मल मोती
बिखर रहे हैं, इनके पहले कभी न देखे गये स्तनमण्डल के समीप में उदित हो रही सुवर्णकान्ति
दृष्टिगोचर होती है । कुररी के शब्द की नाई कर्कश इनकी रोदनध्वनि से रण का शब्द फीका
पड़ गया है । धारावाहिक रूप से निरवच्छिन्न निकली हुई रोदनध्वनियों से इनकी पेट की
पसलिर्यो टूट सी गई है, अतएव ये इस समय क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है, इसका
विवेक करने में असमर्थ हैँ । इनके ये कहीं भाग न जाय, इस भय से एक दूसरे से बधे हुए हाथ
रक्त, कीचड़ ओर आँसुओं से सने हुए हैँ । कख में हाथ डाले हुए पुरुष इन्हें जबरदस्ती ले जा
रहे हैं । इस संकट के समय कोन हमारा प्राणकर्ता होगा, यों कातरदृष्टियोंसे ये नीलकमलों की
वृष्टि कर रही हैं, इन्होंने दया से अपने पक्ष के सैनिकों को रुलाया है । भसींडे के समान स्वच्छ
और निर्मल जँघामूल से जो कि स्वच्छ वस्त्रों के अन्दर कुछ-कुछ दिखाई दे रहे हैं आकाश
नलिनी सी प्रतीत हो रही है, इनकी मालाएँ, वस्त्र, आभूषण ओर अंगराग सभी अस्थिर हैं,
लम्बी-लम्बी ओर चंचल अलकलताएँ (केश) आँसूओं से सनी हुई है, ये आनन्द यानी
विषयसुखरूपी मन्दराचल से मथे जा रहे कामरूपीसागर से उत्पन्न हुई मानों राजाओं की
मूर्तिमती सम्पत्तिर्यो हैं, अथवा राजा अर्थात् चन्द्रमा उससे युक्त लक्ष्म्यो हें