Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
हा तात हेतयो लग्नास्तरुणीकबरीतृणे ।
ज्वलन्ति शुष्कपर्णौघा इव वीरानिलेरिताः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
हाय हाय, युवतियों के केश बन्धन रूपी तिनकों में लगी
हुई और वीररूपी वायु द्वारा फेंकी गई शस्त्राग्नि सूखे हुए पत्ते के ढेर की नाई जलती
है