Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 5–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 5-7
संस्कृत श्लोक
प्रस्तुतेति कथा यावन्मिथो मधुरभाषिणोः ।
तावत्प्रविश्य संभ्रान्त उवाचोर्ध्वस्थितो नरः ॥ ५ ॥
देव सायकचक्रासिगदापीरघवृष्टिमत् ।
महत्परबलं प्राप्तमेकार्णव इवोद्धतः ॥ ६ ॥
कल्पकालानिलोद्धूतकुलाचलशिलोपमम् ।
गदाशक्तिभुशुण्डीनां वृष्टिं मुञ्चति तुष्टिमत् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
मघुर भाषण करनेवाले श्रीसरस्वती
देवीजी और राजा में परस्पर यह वार्तालाप हो ही रहा था कि एक भयचकित पुरुष ने
वहाँ राजा के पास प्रविष्ट होकर और ऊँचे स्थान पर खड़े होकर कहा : महाराज, तरंगाकुल
सागर के समान बाण, चक्र, तलवार, गदा ओर मुद्गरो की वृष्टि करनेवाली बड़ी विशाल
शत्रुसेना हमारी राजधानी पर चढ़ आई है । वह बड़े उत्साह से सम्पन्न है ओर प्रलय की
वायु से उड़ाये गये कुल पर्वतो की शिलाओं के सदृश गदा, शक्ति ओर भुशुण्डियों की वृष्टि
करती है