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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verses 40–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, verses 40–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 40-42

संस्कृत श्लोक

पुष्टषुष्पफलस्कन्धा गतश्रीका गृहद्रुमाः । गता निर्दग्धसर्वस्वा गृहस्था इव दीनताम् ॥ ४० ॥ मातापितृविनिर्मुक्ता बालकास्तिमिरावलीम् । मग्नन्तोऽङ्गेषुरथ्यासु कुड्यपातेन हा हताः ॥ ४१ ॥ वातविद्रावितात्त्रस्यन्कीरण्यो रणमूर्धनि । पतदङ्गारकागारभारिणः कटुकूजितम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

घरों के आस-पास के वृक्षों के फूल, फल और लता आदि जल गये हैं, उनमें शोभा नाममात्र को भी नहीं रह गई है । वे उन गृहस्थों की नाई, जिनका कि सर्वस्व जल गया है, दीनता को प्राप्त हो गये हैं । हाय, माता-पिता से बिछुड़े हुए घने अन्धकार में अपने घरों को खोज रहे बालक बाणों से परिपूर्ण सड़कों पर दीवार के गिरने से मर गये । रणभूमि में वायु से उड़ाये गये और अँगारों को बरसानेवाले घर के छप्पर से हथिनियाँ भीषण चिंघाड़ के साथ डरती थी