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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 30

उनतीसर्वौ सर्ग समाप्त तीसवाँ सर्ग जैसे ब्रह्माण्ड का पहले वर्णन किया गया है वैसे ही ओर उसी प्रकार के विचित्र करोड़ों ब्रह्माण्डों को लीला ने चिदाकाशमें परमाणु के तुल्य देखा इसका वर्णन ।

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  1. Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ओर आकाश के उत्तरोत्तर दसगुने बड़े आवरणों को…
  2. Verses 3–4जैसे आकाश में, धूप में, करोड़ों त्रसरेणु दृष्टिगोचर होते हैं वैसे ही लीला ने सब ब्रह्माण्…
  3. Verses 5–8इस प्रकार के हजारो करोड ब्रह्माण्ड हैं, क्योकि प्रधान यानी अधिष्ठान चैतन्य सर्वगामी है, इ…
  4. Verse 9यदि अधिष्ठानतत्त्व मे दिग्‌विभाग नहीं है, तो अध्यस्त में भी नहीं होगा, क्योकि अध्यस्त केव…
  5. Verse 10यह जगत्‌ मायिक है, अतः मायिक प्रपंचमें इस प्रकार के नियम का व्यभिचार दोषावह नहीं है, इस अ…
  6. Verse 11अथवा सब वस्तु ईश्वरेच्छाधीन हैं, इसलिए पूर्वोक्त नियम का उल्लंघन दोषदायक नहीं है, इस अभिप…
  7. Verse 12वह प्रकार ज्योतिश्चक्र के आधारभूत खगोल से भूगोल को चारों ओर से वेष्टित माननेवाले ज्योतिषश…
  8. Verses 13–15इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की शंका का समाधान कर प्रस्तुत ब्रह्माण्डों की विचित्रता का वर्ण…
  9. Verse 16जैसे ब्रह्माण्ड चिदाकाश के सामने अणुवत्‌ सूक्ष्म है वैसे ही किसी दूसरे पदार्थ के सामने चि…
  10. Verse 17शुद्ध बोधरूप तथा परम प्रकाश के सागर चिदाकाश में ब्रह्माण्डनामक लहरें नित्य उठकर विलीन होत…
  11. Verse 18उनमें कुछ ब्रह्माण्ड अव्याकृत ही भीतर है, ऐसा कहते है । पूर्वं कल्प के सम्पूर्ण संकल्पो क…
  12. Verses 19–22किन्दीं ब्रह्माण्डों के भीतर प्रलय समाप्त होनेवाला घर-घर शब्द प्रवृत्त है, स्वाभाविक अज्ञ…
  13. Verse 23शंका - पहले आप ब्रह्माण्ड के पतन का असम्भव कह चुके है, उसकी क्या गति होगी ? समाधान - वे ब…
  14. Verse 24यदि कोई शंका करे कि “धाता यथा पूर्वमकल्पयत्‌“ (ब्रह्मा ने पूर्व सृष्टि के अनुसार ही ब्रह्…
  15. Verse 25“परम पिता परमेश्वर को अपनी-अपनी तपस्या से प्रसन्न कर आपस में एक दूसरे को जीतने की इच्छा क…
  16. Verses 26–31कुछ ब्रह्माण्ड विचित्र सृष्टि और विचित्र अधिपतिवाले हैं, कुछ ब्रह्माण्ड प्राणियों के कर्म…
  17. Verse 32यदि कोड शंका करे कि भले ही अनन्त ब्रह्माण्ड हों और परस्पर विलक्षण भी हों, लेकिन उनके बाहर…
  18. Verse 33अपनी अशक्ति स्थापन के बहाने जगत विस्तार वर्णन का उपसंहार करते हैं। महामते, जगत्‌ के वर्णन…
  19. Verse 34मुझमें अन्यान्य जगत्‌ के वर्णन की शक्ति न होने से इतने ही जगत्‌ है, ऐसा नहीं सोचना चाहिए…