Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अन्तःशून्याः स्थिताः केचित्संकल्पक्षयरात्रयः ।
तरङ्गा इव तोयेऽब्धौ प्रोह्यन्ते शून्यतार्णवे ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें कुछ ब्रह्माण्ड अव्याकृत ही भीतर है, ऐसा कहते है ।
पूर्वं कल्प के सम्पूर्ण संकल्पो के बीज लिंगरूप उपाधि का क्षय होने पर अन्धकारस्वरूप
रात्रियों के समान अव्याकृत कुछ ब्रह्माण्ड भीतर स्थित हैं । जलमें तरंगों की नाई शून्यतारूप
सागर में उनकी प्रकर्षं से तर्कना होती है । “केसे असत् से सत् उत्पन्न होगा ?” इत्वर्थक
श्रुति युक्ति से वे हैं ऐसी तर्कना की जाती है, यह अर्थ हे