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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

भीमान्धकारगहने सुमहत्यरण्ये नृत्यन्त्यदर्शितपरस्परमेव मत्ताः । यक्षा यथा प्रवितते परमाम्बरेऽन्तरेवं स्फुरन्ति सुबहूनि महाजगन्ति ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

मुझमें अन्यान्य जगत्‌ के वर्णन की शक्ति न होने से इतने ही जगत्‌ है, ऐसा नहीं सोचना चाहिए किन्तु अन्य लोगों द्वारा अद्रष्ट (अज्ञात) अनन्त जगत्‌ हैं, क्योकि माया में अनन्त जगर्तो की सृष्टि करने की असीम सामर्थ्य है, ऐसा दृष्टान्तपूर्वक कहते हैं । भीषण अन्धकार से व्याप्त बड़े भारी अरण्य में जैसे मदोन्मत्त भूतगण परस्पर एक दूसरे के स्वरूप को देखे बिना नाच करते हैं, वैसे ही अविद्या से आवृत ब्रह्म में बहुत से महाजगत्‌ स्फुरित होते हैं