Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
किमधः स्यात्किमूर्ध्वं स्यात्किं तिर्यक्तत्र भासुरे ।
इति ब्रूहि मम ब्रह्मन्निहैव यदि न स्थितम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि अधिष्ठानतत्त्व मे दिग्विभाग नहीं है, तो अध्यस्त में भी नहीं होगा, क्योकि अध्यस्त
केवल अधिष्ठान दशा में स्थित रहता है, ऐसा नियम है, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी शंका
करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, यदि अधिष्ठानतत्त्वमें ही पहले ऊर्ध्व, अधः, तिर्यक्
नहीं था, तो कल्पना द्वारा प्रतीत हो रहे जगत् में क्या नीचे होगा, क्या ऊपर होगा ओर क्या
तिरछा होगा अर्थात् अधिष्ठानमें कल्पित जगत्मे अधः, ऊर्ध्व ओर तिर्यक् का संभव कैसे
है ? ब्रह्मन्, यह आप कृपापूर्वक मुझे समझाइये