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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verses 19–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verses 19–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 19-22

संस्कृत श्लोक

केषांचिदन्तःकल्पान्तः प्रवृत्तो घर्घरारवः । न श्रुतोऽन्यैर्न च ज्ञातः स्वभावेन रसाकुलैः ॥ १९ ॥ अन्येषां प्रथमारम्भे शुद्धभूषु विजृम्भते । सर्गः संसिक्तबीजानां कोशेऽङ्कुरकला यथा ॥ २० ॥ महाप्रलयसंपत्तौ सूर्यार्चिर्विद्युतोऽद्रयः । प्रवृत्ता गलितुं केचित्तापे हिमकणा इव ॥ २१ ॥ आकल्पं निपतन्त्येव केचिदप्राप्तभूमयः । यावद्विशीर्य जायन्ते तथा संविन्मयाः किल ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

किन्दीं ब्रह्माण्डों के भीतर प्रलय समाप्त होनेवाला घर-घर शब्द प्रवृत्त है, स्वाभाविक अज्ञान से विषयों में प्रीति से व्याकुल हुए अन्य लोगों ने न उसे कभी सुना और न जाना ही, क्योकि वे स्वाभाविक अज्ञान से विषयों में जो प्रीति होती है उससे आकुल हैं । अन्य ब्रह्माण्ड में प्राथमिक कल्प, युग आदि के आरम्भ मेँ प्रथम उत्पन्न प्राणियों द्वारा दूषित न होने के कारण शुद्ध भुवनोंमें जैसे जल से सीचि हुए बीजों के कोष से सफेद अंकुर निकलता है वैसे ही सृष्टि होती हे । किन्हीं ब्रह्माण्डों मे महाप्रलय की प्राप्ति होने पर जैसे सन्ताप लगने से हिमकण गलते हैं, वैसे ही सूर्य, अग्नि ओर बिजलियाँ पहले भुवनो को जलाकर स्वयं गलने लगते हैँ । कुछ ब्रह्माण्ड आधार भूमि को न पाकर कल्पपर्यन्त गिरते ही रहते हैं, जब तक कि बिलकुल चूरचूर होकर फिर न पैदा हों