Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
केचिद्ब्रह्मादिपुरुषाः केचिद्विष्ण्वादिसर्गपाः ।
केचिच्चान्यप्रजानाथाः केचिन्निर्नाथजन्तवः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
“परम पिता परमेश्वर को अपनी-अपनी तपस्या से प्रसन्न कर आपस में एक दूसरे को
जीतने की इच्छा करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, शिव परस्पर से उत्पन्न होते हैँ इस प्रकार पुराणों
में ब्रह्मा, विष्णु ओर रुद्र की कल्प के भेद से परस्पर से उत्पत्ति कही गई है जिस कल्प में जो
उत्पादक होगा, उसकी प्रधानता होने पर उनके गुणोके भेद से कभी सत्वगुण की प्रधानता
होगी, कभी रजोगुण की और कभी तमोगुण की प्रधानता होगी, यों सत्त्व आदि गुणों की प्रधानता
के कारण भी सृष्टि में विचित्रता का होना, इस आशय से कहते हैं।
कुछ ब्रह्माण्डों के ब्रह्मा ही सृष्टिकर्ता हैं, कुछ के विष्णु ही अधिपति हैं, कुछ के रुद्र,
भैरव, दुर्गा, विनायक आदि अध्यक्ष हैं, क्योंकि उनके महात्म्य का वर्णन करनेवाले पुराणों
में वे भी ब्रह्मा के नियन्ता कहे गये हैं । कुछ ब्रह्माण्डों में मृग, पक्षी आदि जन्तु किसी के
नियन्त्रण के बिना ही स्वच्छन्द रहते हैं