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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । पृथिव्यप्तेजसां तत्र नभस्वन्नभसोरपि । यथोत्तरं दशगुणानतीत्यावरणान्क्षणात् ॥ १ ॥ ददर्श परमाकाश तत्प्रमाणविवर्जितम् । तथा ततं जगदिदं यथा तत्राण्डमात्रकम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ओर आकाश के उत्तरोत्तर दसगुने बड़े आवरणों को एक क्षण में लाँधकर लीला ने पूर्वोक्त परिमाणसहित अविद्याशबलित चिदाकाश देखा, उक्त आकाश में जैसे यह ब्रह्माण्डरूप जगत्‌ विस्तृत है वैसे ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डं को भी उसने विस्तृत देखा

सर्ग सन्दर्भ

उनतीसर्वौ सर्ग समाप्त तीसवाँ सर्ग जैसे ब्रह्माण्ड का पहले वर्णन किया गया है वैसे ही ओर उसी प्रकार के विचित्र करोड़ों ब्रह्माण्डों को लीला ने चिदाकाशमें परमाणु के तुल्य देखा इसका वर्णन ।