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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

तस्मिन्सर्वं ततः सर्वं तत्सर्वं सर्वतश्च यत् । तच्च सर्वमयो नित्यं तथा तदणुकं प्रति ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे ब्रह्माण्ड चिदाकाश के सामने अणुवत्‌ सूक्ष्म है वैसे ही किसी दूसरे पदार्थ के सामने चिदाकाश भी क्यों न परमाणुतुल्य सूक्ष्म हो ? इस शंका पर कहते हैं । स्थितिकाल में सम्पूर्ण पदार्थ चिदाकाश में रहते हैं, सृष्टिकाल में उससे उत्पन्न होते हैँ, प्रलय में सब उसी में लीन हो जाते हैं । ऐसी परिस्थिति में सब दिशाओं में सब कालो में और सब वस्तुओं में वहीं है,उससे अतिरिक्त कोई नहीं है। वही नित्य सर्वमय आत्मा है, उस प्रकार का वह किसके प्रति अणु होगा ? किसी के प्रति भी वह अणु नहीं हो सकता है, यह अर्थ है