Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ससर्वावरणा एते महत्यन्तविवर्जिते ।
ब्रह्माण्डा भान्ति दुर्दृष्टेर्व्योम्नि केशोण्ड्रको यथा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत् मायिक है, अतः मायिक प्रपंचमें इस प्रकार के नियम का व्यभिचार दोषावह
नहीं है, इस अभिप्राय से पहले श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जैसे आकाश में भ्रमवश केशों का कुण्डलाकार गोला दिखलाई
पड़ता है वैसे ही अज्ञान से दूषित दृष्टिवाले पुरुष को असीम महान् चिदाकाशमें सम्पूर्ण
आवरणोंसे युक्त ये ब्रह्माण्ड प्रतीत होते हैं