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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

पिपीलिकानां महतां व्योम्नि वर्तुललोष्टके । दशदिक्कमधः पादाः पृष्ठमूर्ध्वमुदाहृतम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

वह प्रकार ज्योतिश्चक्र के आधारभूत खगोल से भूगोल को चारों ओर से वेष्टित माननेवाले ज्योतिषशास्त्रकारों को भी मान्य है, यह दशनि के लिए उनके द्वारा उदाहृत दृष्टान्त करते हैं । जैसे गोल पत्थर या ढेले में चींटियाँ चिपकी रहती हैं, जिस ओर चींटियों के पैर होते हैं वह नीचे का भाग है और जिधर पीठ रहती है वह ऊपर का भाग है, वैसे ही दसों दिशाओं में संलग्न लोगों के पैर नीचे को ही होते हैं और पीठ ऊपर को होती है, यह सब सूर्यसिद्धान्त में कहा गया है