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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 116

21 verse-groups

  1. Verse 1मानसिक राजसूययज्ञ का फल है, इसे लवण राजा जान नहीं सकता
  2. Verse 2यद्यपि अन्य लोगों के लिए उसमें प्रमाण का अवसर नहीं है तथापि योगबल से मुझे वह प्रत्यक्ष है…
  3. Verses 3–4उस ऐन्द्रजालिक के चले जाने पर सभासदों ने और राजा लवण ने बड़े प्रयत्न से मुझसे पूछा कि यह…
  4. Verse 5राजसूययज्ञ करनेवाले लोग बारह वर्षतक आपत्ति रूप दुःख को प्राप्त होते हैं, जिसमें विविध प्र…
  5. Verses 6–7हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलिए इन्द्र ने राजा लवण के दुःख के लिए ऐन्द्रजालिक का वेष धारण किये…
  6. Verse 8इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, राजा लवण ने राजसूययज्ञ का फल रूप वह क्लेश पाया, यह प्रत्यक्ष ही…
  7. Verse 9इसमें मधुब्राह्मण श्रुति प्रमाण है : इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्ये सर्वाण…
  8. Verse 10गुरू की उक्ति का निचोड़ अर्थ अनुवादपूर्वक दिखलाते हुए श्रीयमवन्द्रजी अपनी बुद्धि के द्वार…
  9. Verse 11मन के उच्छेद का उपाय कहने के लिए श्रीवस्िष्ठजी प्रतिज्ञा करते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा :…
  10. Verse 12यदि श्रीरामचन्द्रजी शंका करें, जिस मन का अनादि संसार में कभी नाश हुआ ही नहीं, उसके विनाश…
  11. Verse 13अपने संकल्प की विचित्रता से ब्रह्माण्डाकार में परिणित हिरण्यगर्भ के मन का विनाश प्रलयमें…
  12. Verse 14हम लोगों का जन्म, मरण आदि संसार भी उसी की कल्पना है, ऐसा कहते है । जगत्‌ मेँ जन्म-मरण, सु…
  13. Verse 15फिर सृष्टिकाल में भगवान के नाभिकमल से आविर्भूत होकर दूसरे कल्प की सृष्टि के रूप से पूर्व…
  14. Verse 16इस प्रकार अन्य हिरण्यगर्भो के मन में भी नश्वरता प्रमाणसिद्ध है, ऐसा कहते है । इस ब्रह्माण…
  15. Verse 17जैसे समष्टि मन पुरुष के प्रयत्न से होने वाले उपासना और ज्ञान से वृद्धि को प्राप्त होते है…
  16. Verse 18संक्षेप से सूचित अर्थ का व्याख्यान करने की इच्छावाले श्रीवसिष्ठजी पहले ईश्वरादागत्य (ईश्व…
  17. Verse 19तदनन्तर पहले प्राप्त रूप, रस ओर गन्धरूप तन्मात्रा के क्रम से अपंचीभूत पंचतन्मात्रता को प्…
  18. Verse 20तदनन्तर उससे जीव उत्पन्न होता है । जन्म के अनन्तर कदाचित्‌ पुण्य की अधिकता से वह कर्म ओर…
  19. Verse 21उस पुरुष को पैदा होते ही बचपन से लेकर विद्याध्ययन करना चाहिये ओर तत्वज्ञानी गुरु का अनुगम…
  20. Verses 22–23तब क्रमशः पुरुष को तुम्हारे तुल्य विवेक, वैराग्य आदि साधन सम्पत्ति होती हे । चित्तवृत्तिक…
  21. Verse 24गद्यों द्वारा उक्त अर्थ के सारांश को पद्य से कहकर उपसंहार करते हुए उक्त प्रकार के युरुषमे…