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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

तस्मात्प्रत्यक्षमेवैतद्राम नात्र संदेहोऽस्ति । मनो हि विलक्षणानां क्रियाणां कर्तृ भोक्तृ च तदेव निर्घृष्य संशोध्य चित्तरत्नमिह हिमकणमिवातपेन विलीनतां विवेकेन नीत्वा परं श्रेयः प्राप्स्यसि । चित्तमेव सकलभूताडम्बरकारिणीमविद्यां विद्धि । सा विचित्रकेन्द्रजालवशादिदमुत्पादयति । अविद्याचित्तजीवबुद्धिशब्दानां भेदो नास्ति वृक्षतरुशब्दयोरिवेति ज्ञात्वा चित्तमेवविकल्पनं कुरु । अभ्युदिते चित्तवैमल्यार्कबिम्बे सकलङ्कविकल्पोत्थदोषतिमिरापहरणं न तदस्ति राघव यन्न दृश्यते यन्नात्मीक्रियते यन्न परित्यज्यते यन्न म्रियते यन्नात्मीयं यन्न परकीयं सर्वं सर्वदा सर्वो भवतीति परमार्थः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, राजा लवण ने राजसूययज्ञ का फल रूप वह क्लेश पाया, यह प्रत्यक्ष ही है । इसमें सन्देह नहीं है । मन विलक्षण-विलक्षण क्रियाओं को करता है और भोग करता हे । हठयोग से मन रूप रत्न को घिसकर राजयोग से शुद्ध कर निर्विकल्प समाधि से उसको सूर्य के ताप से बर्फ के टुकड़े की नाई विलीन कर आप तत्त्व साक्षात्कार से परम श्रेय को प्राप्त होंगे। चित्त को ही सब प्राणियों के आडम्बर को करनेवाली अविद्या जानिये। विविध प्रकारकी विचित्र रचनाओं की प्रकृतिभूत इन्द्रजाल के तुल्य जो वासना है उससे अविद्या इसको उत्पन्न करती है । अविद्या, चित्त, जीव, बुद्धि शब्दों में वृक्ष ओर तरु शब्दों की भाँति भेद नहीं है, ऐसा जानकर चित्त को ही कल्पनाशून्य कीजिये । चित्तविमलतारूप सूर्यविम्ब के उदित होने पर कलंकयुक्त विकल्पों से उत्पन्न हुए दोषरूपी अन्धकार का नाश हो जायेगा । यदि कोई शंका करे कि अपने चित्त का लय होने पर या अपनी अविद्या का क्षय होने पर अपने अदृष्ट उपार्जित अपनी अविद्या के कार्य की ही निवृत्ति होगी, सबके अदृष्ट से उपार्जित अविद्या के कार्य की निवृत्ति नहीं होगी, क्योकि अपना चित्त उनके कार्य का कारण नहीं है, इस पर सब के अदृष्ट से उपार्जित कार्य ओर सबके उपभोग्य सब अविद्या कार्य ही है, सर्वात्मक आत्मदर्शन से उनका दर्शन हो जाता है, सब आत्मभूत किया जाता है, सबका त्याग किया जाता है और सबका विनाश किया जाता है, इसमें तनिक भी असम्भावना नहीं करना चाहिये, इस आशय से कहते हैं : चित्त विमलतारूप सूर्य के उदित होने पर वह वस्तु नहीं हे, जो न देखी जाती हो, वह वस्तु नहीं है, जो आत्मस्वरूप न की जाती हो, वह वस्तु नहीं है, जिसका परित्याग न किया जाता हो, क्योकि वह वस्तु नहीं हे जो आत्मीय न हो, वह वस्तु नहीं है जो परकीय न हो, सब आत्मीय होता है, सब परकीय होता हे, सब सदा सब होता है, यह परमार्थ स्थिति हे