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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

कालोदितः संकल्पवशात् पुनरन्यतया जायते सापि पुनर्विलीयते पुनरप्युदेति सैवेति भूयोभूयोऽनुसंसरन्ती स्वयमुपशाम्यति ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

फिर सृष्टिकाल में भगवान के नाभिकमल से आविर्भूत होकर दूसरे कल्प की सृष्टि के रूप से पूर्व की कल्पना उत्पन्न होती है ओर फिर कल्पान्त में लीन हो जाती है ओर फिर उदित होती है । इस प्रकार जब तक अधिकारप्रापक प्रारब्ध का क्षय नहीं होता, तब तक संसार के प्रवाह में बहते हुए प्रारब्ध का क्षय होने पर स्वतः स्फुरित हुए आत्मबोध से अपने आप शांत हो जाती है