Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
तादृग्विवेकवति संकलिताभिमाने पुंसि स्थिते विमलसत्त्वमयाग्न्यजातौ ।
सप्तात्मिकावतरति क्रमशः शिवाय चेतःप्रकाशनकरी ननु योगभूमिः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
गद्यों द्वारा उक्त अर्थ के सारांश को पद्य से कहकर उपसंहार करते हुए उक्त प्रकार के
युरुषमे आत्यन्तिक मनोनाश की उपायभूत योगभूमिका का अवतरण करते है ।
अन्यान्य साधनों से वृद्धि को प्राप्त हुए पूर्व विवेक से युक्त, निर्मल सत्त्वगुणमयी ब्राह्मणादि
उत्तम जातिवाला में हू यो अभिमान रखनेवाले अधिकारी पुरुष के अटल होने पर परमपुरुषार्थ
के लिए आगे कही जानेवाली सात प्रकार की योगभूमिका, जो कि चित्त को ज्ञान द्वारा प्रकाशमान
करनेवाली है, क्रमसे (चित्त की उपरमताके तारतम्य के क्रम से) आविर्भूत होती हे