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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

ततः क्रमात्पुंसस्तवेव चमत्कृतिर्जायत्ते ॥ २२ ॥ स्वच्छदृशा चित्तवृत्तेः पुरुषस्य हेयोपादेयविचार उत्पद्यते ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

तब क्रमशः पुरुष को तुम्हारे तुल्य विवेक, वैराग्य आदि साधन सम्पत्ति होती हे । चित्तवृत्तिकी स्वच्छदुष्टि से पुरुष को संसाररूपी अनर्थ हेय है और मोक्षोपाय उपादेय हे, ऐसा विचार उत्पन्न होता हे