Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 3 ,4
संस्कृत श्लोक
अहं सभ्यैस्ततस्तत्र गते शाम्बरिकर्मणि ।
किमेतदिति यत्नेन पृष्टश्च लवणेन च ॥ ३ ॥
चिन्तयित्वा मया दृष्ट्वा तत्र तत्कथितं ततः ।
श्रृणु तत्ते प्रवक्ष्यामि राम शाम्बरिकेहितम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उस ऐन्द्रजालिक के चले जाने पर
सभासदों ने और राजा लवण ने बड़े प्रयत्न से मुझसे पूछा कि यह क्या हुआ ? लवण और
सभासदों के पूछने पर योगबल से देखकर और विचारकर मैंने वहाँ पर उनसे जो ऐन्द्रजालिक
का अभिप्राय कहा था, वह आपसे कहूँगा, आप सुनिये