Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
तत्रजननमरणसुखदुःखमोहादिकं संसरणं कल्पयन्ती कल्पानुरचना बहुनाममन्थरं स्थित्वा स्वयं विलीयते हिमकणिकेवातपगता ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हम लोगों का जन्म, मरण आदि संसार भी उसी की कल्पना है, ऐसा कहते है ।
जगत् मेँ जन्म-मरण, सुखदुःख, मोह आदि संसार की कल्पना करती हुई, चार हजार
युगवाले अपने दिनों मे तत्-तत् अनुकूल रचनाओं द्वारा निर्मित देवता, असुर आदि के अनन्त
नामों से भारपूर्वक स्थित होकर जैसे धूप में रक्खा हुआ बर्फ का टुकड़ा अपने कारण तेज में
लीन हो जाता है, वैसे ही वह भी शेषशय्याशायी भगवान् विष्णु में स्वयं विलीन हो जाती
हे