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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

एवमस्यां तादृशि वर्तमानायामीश्वरादागत्यजीवो यथा जीव्यते विमुच्यते तच्छ्रुणु ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे समष्टि मन पुरुष के प्रयत्न से होने वाले उपासना और ज्ञान से वृद्धि को प्राप्त होते हैं और शान्त होते हैं, वैसे ही व्यष्टि जीवो के मन भी जन्म-मरण के हेतु काम, कर्म, वासना और संकर्ल्पो से बढ़ते है । निरोध और ज्ञानाभ्यास के प्रकर्ष से शान्त हो जाते हैं, इसलिए मनोनाश असम्भावनीय नहीं है, इस आशय से सृष्टिकाल से लेकर मोक्ष पर्यन्त जीवसृष्टि का संक्षेप और विस्तार से वर्णन करते है । पूर्वोक्त समष्टि कल्पना के परमात्मा में स्थित होने पर व्यष्टि जीव जैसे परमात्मा में स्थित होने पर व्यष्टि जीव जैसे परमात्मा से आकर जीता है ओर मुक्त होता है, उसे सुनिये