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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मणो मनःशक्तिरभ्युदिता पुरःस्थिताकाशशक्तिमवलम्ब्य तत्रस्थपवनतानुपातिनी घनसंकलत्वं गच्छति ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

संक्षेप से सूचित अर्थ का व्याख्यान करने की इच्छावाले श्रीवसिष्ठजी पहले ईश्वरादागत्य (ईश्वर से आकर) इस अंश का विवरण करते है । प्रलयकाल में उपाधि का विलय होने से अव्याकृत में लीन हुए जीवों की संस्कारमात्र से अवशिष्ट मनःशक्ति-पहले अव्याकृत से शब्दतन्मात्ररूप आकाशशक्ति का आविर्भाव होने पर पहले से उत्पन्न उसी आकाशशक्ति का अवलम्बन करके स्वयं भी उदित होकर पवनशक्तिरूप स्पर्शतन्मात्र की उत्पत्ति होने पर पवन में स्थित पवनता के अनुसरण करने वाली हो- ईषत्‌ चलनरूप घनसंकल्पता को प्राप्त होती है