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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 102

लि एक सौ एकर्वौँ सर्ग समाप्त एक सौ दोवाँ सर्ग अहंकार और संकल्प के विनाश के उपाय का, अनात्मवर्ग के विवेक का तथा परमात्मा की नित्यता का निरूपण ।

35 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, जैसे बालक अपने संकल्प से ठूँठ आदि में वेताल आदि की…
  2. Verse 2क्षयसंकल्पात्‌ (क्षीयते डति क्षयो नश्वरात्मा तत्संकल्पात्‌ यानी नश्वरात्ाके संकल्प से) इस…
  3. Verse 3भाव यहहै कि क्या नित्य आत्मा नश्वर आत्मा का संकल्प करता है या नश्वर आत्मा ही नश्वर आत्मा…
  4. Verse 4यदि कोई शंका करे कि अहंकार की आत्मस्वभावता ही क्यो न हो, उसका मिथ्यात्व कैसे ? उस पर कहते…
  5. Verse 5भेदरहित परमात्मामें वास्तव में अहंकार है ही नहीं । जैसे भ्रान्तिवश तीव्र सूर्य के प्रकाश…
  6. Verse 6मनरूपी चिन्तामणि की बड़ी भारी कार्यसमूहसृष्टि संसाररूप से देखी जाती हे । शंका - तो क्या म…
  7. Verse 7इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, आप असद्‌विषयिणी भ्रान्ति का त्याग कीजिये ओर सत्यार्थविषयक तथा स…
  8. Verse 8असद्विषयक भ्रम के त्याग ओर सद्‌विषयक सम्यक्‌ दर्शन के आश्रय के लिए कौन उत्तम उपाय है, ऐसी…
  9. Verse 9आप वास्तव में वधे नहीं है, फिर भी “नें बँधा हूँ ऐसा मानकर आप व्यर्थ ही क्यों शोक कर रहे ह…
  10. Verse 10अद्वितीय परमात्मा में भेद ओर अभेद की भ्रान्ति हो रही है । इस सकल प्रपंच के बाध द्वारा ब्र…
  11. Verse 11छेदन और भेदन के अयोग्य ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर देह के छेदन, भेदन आदि से होनेवाले दु…
  12. Verse 12नष्ट नहीं होती वैसे ही देह के नष्ट होने पर, कटने पर या क्षीण होने पर आत्मा की कोई क्षति न…
  13. Verse 13देह चाहे नष्ट हो चाहे अभ्युदय को प्राप्त हो इससे हमारी कौन हानि हुई ? फूल के छिन्न-भिन्न…
  14. Verse 14शरीर रूपी कमलमें सुख-दुःखरूपी तुषारपात भले ही होता रहे, उससे आकाश में उड़नेवाले भ्रमररूपी…
  15. Verse 15देह चाहे गिर पड़े, चाहे उठ खड़ा हो अथवा दूसरे आकाश में चला जाय । मेरा स्वरूप तो उससे बिलक…
  16. Verse 16हे श्रीरामजी, जैसे मेघ और वायु का सम्बन्ध है जैसे भवर और कमल का सम्बन्ध है वैसे ही आपके श…
  17. Verse 17दूसरी बात यह है कि यदि शरीर आदि समस्त जगत्‌ को एकमात्र मन ही मानो, तो भी मन के रहते शरीर…
  18. Verse 18आत्मा के नाश की भान्ति ही सब शोकों की जड़ है, अतः उसका पुनः वारण करते हुए कहते हैं। हे मह…
  19. Verse 19जैसे मेघ के छिन्‍न-भिन्‍न होने पर वायु तथा कमल के सूखने पर भँवर विस्तीर्ण आकाश में चला जा…
  20. Verse 20इस संसार मे विचरण कर रहे (आवागमनरत) प्राणी का ज्ञानरूपी अग्नि के बिना मन तक नष्ट नहीं होत…
  21. Verses 21–23बटलोई और बेर का जो न्याय है और घड़े और आकाश का जो न्याय है, वही न्याय विनाशी ओर अविनाशी द…
  22. Verse 24जीवों का मनोमय शरीर देश और काल से तिरोहित है तथा मरण रूपी वस्त्र से बार-बार आच्छन्न रहता…
  23. Verse 25मरण क्या है ? इस प्रश्न पर कहते हैं । हे महाबाहो, मरण देश और काल का तिरोधानमात्र ही है दे…
  24. Verse 26इसलिए हे रामचन्द्रजी, जैसे आकाश में उड़ने के लिए उत्कण्ठित पक्षीका बच्चा, जिसके पंख जम गय…
  25. Verses 27–29यह वासना इष्ट और अनिष्ट में अनुराग और द्वेष से अभिनिवेशरूप बन्धन करनेवाली मानसी शक्ति है।…
  26. Verse 19जैसे कुहरा होने पर भ्रान्त पुरुष आकाश को कुहरे से मलिन यानी अनिर्मल देखते हैं वैसे ही भ्र…
  27. Verse 30इस मानसी शक्ति ने ही इस विशाल जगत्‌ को दीर्घकालीन स्वप्न के तुल्य असत्‌ होते हुए भी विविध…
  28. Verse 31जैसे तिमिर आदि दोष से दूषितनेत्र आकाश में मोर के पंख, केशों के वर्तुलाकार गोले के आकार के…
  29. Verse 32अतएव अविचारजनित द्वैत की भावनामात्र से सिद्ध जगत्‌ का विचारजन्य ज्ञानमात्रसे लय होता है,…
  30. Verses 33–34जैसे शीत के अभाव को चाहनेवाले सूर्य के अपने उदयमात्रसे शीत का नाश हो जाता है वैसे ही मन क…
  31. Verses 35–36(स्वसंहाररूप) नाटक को (स्वरचित नाटक को) देखकर मारे आनन्द के खूब नाचता है। केवल अपने विनाश…
  32. Verse 37मन के विनाश का उपाय खोज रहे विवेकी पुरुषों के मनोनाश को मन स्वयं अपने संकल्प से शीघ्र सिद…
  33. Verses 38–39विवेक से संस्कृत (शुद्ध) हुआ मन अपने पूर्वकालीन संकल्पविकल्प-अंश का परित्याग कर ब्रह्माका…
  34. Verse 40उक्त अर्थ की उपेक्षा करने पर अनर्थ की प्राप्ति होती है, यह दशति इए उपसंहार करते हैं । अति…
  35. Verse 41श्री मुनिजी के ऐसा कहने पर दिन बीत गया भगवान्‌ सूर्य अस्ताचल में डूब गये, सब मुनियों की स…