Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
एकस्मिन्नेव सर्वस्मिन्स्थिते परमवस्तुनि ।
कुतः कोऽयमहं नाम कथं नाम किलोदितः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि अहंकार की आत्मस्वभावता ही क्यो न हो, उसका मिथ्यात्व
कैसे ? उस पर कहते हैं।
जब एकमात्र परिपूर्ण परमवस्तु ही स्थित है, तब यह अहंकार नाम का कौन है और कहाँ
से केसे उदित हुआ है ? अद्वितीय पूर्ण परमवस्तु से अतिरिक्त अहंकारनामक कोई वस्तु नहीं
है, यह भाव है