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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verses 35–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

स्वविनाशक्रियां चैतां मन एव करोत्यलम् । मनो ह्यात्मवधं नाम नाटकं परिनृत्यति ॥ ३५ ॥ आत्मानमीक्षते चेतः स्वविनाशाय केवलम् । नहि जानाति दुर्बुद्धिर्विनाशं प्रत्युपस्थितम् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

(स्वसंहाररूप) नाटक को (स्वरचित नाटक को) देखकर मारे आनन्द के खूब नाचता है। केवल अपने विनाशके लिए चित्त आत्मा का दर्शन करता है, पर दुर्बुद्धि यह मन उपस्थित हुए अपने विनाश को नहीं जानता है