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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

अविरलसुखदुःखवृक्षखण्डे विषमकृतान्तमहोरगे वनेऽस्मिन् । प्रभुरिदमखिले विवेकहीनं सुभग मनो महदापदेकहेतुः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ की उपेक्षा करने पर अनर्थ की प्राप्ति होती है, यह दशति इए उपसंहार करते हैं । अति सघन दुःख-सुख रूप वृक्षों के झुण्डों से भरपूर, क्रूर कालरूपी विषैले साँप से युक्त, दुरुच्छेद्य इस संसाररूपी असिपत्रवन में यह विवेकहीन मन ही एकमात्र प्रभु - दुखों का, जिनका आर-पार नहीं है, हेतु -तथा संसारी जीवों की विपदाओं का एकमात्र कारण है