Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अनार्तोऽप्यार्तिमान्भाति च्छिन्नेऽङ्गे किंच ताम्यति ।
भेदाभेदविकारार्तिः काचिन्नात्मनि विद्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
छेदन और भेदन के अयोग्य ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर देह के छेदन, भेदन आदि से
होनेवाले दुःख का भी अवसर नहीं आता है फिर अन्य क्लेशो की तो बात ही क्या है, ऐसा
कहते हैं।
जब तक ब्रह्म साक्षात्कार नहीं होता, तभी तक देह आदि के पीड़ित होने पर पीड़ा से
रहित भी जीव पीड़ा से युक्त सा प्रतीत होता है । अंग के कट जाने पर कोप करता है, पर जब
आत्मा का दर्शन हो जाता है तब ये नहीं होते । परमात्मा में भेद, अभेद, छेदन, भेदन आदि
विकार एवं उनसे होनेवाली पीड़ा कुछ भी नहीं है