Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अबद्धो बद्ध इत्युक्त्वा किं शोचसि मुधैव हि ।
अनन्तस्यात्मतत्त्वस्य किं कथं केन बध्यते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
आप वास्तव में वधे नहीं
है, फिर भी “नें बँधा हूँ ऐसा मानकर आप व्यर्थ ही क्यों शोक कर रहे हैं ? आत्मतत्व का
जो कि असीम है, क्या, किससे और कैसे बोधा जा सकता है अर्थात् जब एक अद्वितीय
असीम आत्मतत्व ही है तब फिर कौन किसके द्वारा कैसे बद्ध होगा ?