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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

नानाऽनानात्वकलना त्वविभिन्नमहात्मनि । सर्वस्मिन्ब्रह्मतत्त्वेऽस्मिन्किं बद्धं किं विमुच्यते ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

अद्वितीय परमात्मा में भेद ओर अभेद की भ्रान्ति हो रही है । इस सकल प्रपंच के बाध द्वारा ब्रह्ममात्र शेष होने पर कौन बद्ध ओर कौन मुक्त होता है ? सम्पूर्ण प्रपंच के ब्रह्ममात्र शेष होने पर बद्ध-मुक्त की कोई कथा ही नहीं हे