Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
मनो राम शरीरं हि जगतः सकलस्य च ।
आद्या शक्तिश्चिदध्यात्मा न नश्यति कदाचन ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरी बात यह है कि यदि शरीर आदि समस्त जगत् को एकमात्र मन ही मानो, तो भी मन
के रहते शरीर आदि के नाश से होने वाला शोक उचित नहीं है । यदि उन्हें एकमात्र आत्मा
माना जाय, तो ऐसी स्थिति में तो शरीर आदि के नाश से होनेवाले शोक आदि की कथा ही
नहीं उठती है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, मन सम्पूर्ण जगत् का स्वरूप है । मनकी हेतु आद्या शक्ति यानी
आदिकारण चिदात्मा है वह मन से भी बढ़कर है, वह कभी भी नष्ट नहीं होता है, उसके नाश
की भ्रान्ति सर्वथा अनुचित है