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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

भावनामात्र एवास्याः स्वरूपं कर्तृतां गतम् । जगन्नामाविलं चक्षुर्व्योम्नि बिम्बरुचामिव ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे तिमिर आदि दोष से दूषितनेत्र आकाश में मोर के पंख, केशों के वर्तुलाकार गोले के आकार के चन्द्रमा, सूर्य आदि के बिम्ब के विभावनामात्र मेँ कर्ता होता है वैसे ही इसका स्वरूप जगत्‌ के आकार की भावनामात्रमे ही कर्तृता को प्राप्त हुआ है, उससे अतिरिक्त के निर्माण प्रसिद्ध नहीं हे, अतः वही जगत्‌ के नाम से सिद्ध हुआ है