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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

योऽसावात्मा महाप्राज्ञ न नश्यति न गच्छति । न नश्यति कदाचिच्च किं मुधा परितप्यसे ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मा के नाश की भान्ति ही सब शोकों की जड़ है, अतः उसका पुनः वारण करते हुए कहते हैं। हे महामते, यह जो आत्मा है यह न तो नष्ट होता है और न जाता है । इसका कदापि विनाश नहीं होता, आप इसके विनाश के भय से क्यों वृथा सन्ताप करते हैं ?