Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 19
अठारहर्वौँ सर्ग समाप्त उन्नीयवाँ सर्ग दृष्टान्त के अर्थनिरूपण के सिलसिले में नित्य अपरोक्ष द्रष्टा, दृश्य आदि के साक्षी ब्रह्मरूप प्रमाणतत्व का शोधन ।
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- Verse 1प्रासंगिकता समर्थन कर उससे सम्बद्ध प्रमाणतत्त्व का निर्णय करने के इच्छुक श्रीवसिष्ठजी ने…
- Verse 2दृष्टान्त बुद्धि का फल कहते हैं । तत् ओर त्वं पदार्थ के परिशोधन के उपयोगी तत्-तत् दृष्…
- Verse 3तो किससे प्रयोजन है ? इस पर कहते है। जिस किसी युक्ति से (पदार्थ, लक्ष्यार्थ ओर तात्पर्यार…
- Verse 4यदि कोई कहे कि सम्पूर्ण संसार की शान्ति होने पर उसके अन्तर्गत दरष्टान्त, युक्ति आदिका भी…
- Verse 5“ओषधं पिब भ्रातुरिव ते शिखा वर्धिष्ति (ओषधि पीओ, भाई के समान तुम्हारी भी शिखा बढ़ जायेगी)…
- Verse 6प्रकृत स्थल में उपयुक्त होने के कारण अनात्मविषयक दृष्टान्त दे रहे श्रीवस्रिष्ठजी श्रीरामच…
- Verses 7–11इस प्रकार के दृष्टान्तो द्वारा बोधित, पुरुष को प्रयत्नपूर्वक परम पद प्राप्त करना चाहिए और…
- Verse 12यह तो आप परस्पर विरुद्ध कहते है शृहस्थस्य तथा यतेः“ इससे तत्-तत् आश्रम में नियत धर्मो म…
- Verse 13हे श्रीरामजी, आपको जिस किसी भी युक्ति से ज्ञातव्य पदार्थ का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहि…
- Verses 14–15लक्षणों द्वारा दो प्रकार के बोधचंचुओं का निर्देश करते हैं । हृदयरूपी संविदाकाश में विश्रा…
- Verses 16–21प्रासंगिक बोधचंचु के लक्षण को कहकर प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के तत्त्व के परीक्षणपूर्वक जीवक…
- Verse 22यद्यपि एक ही में वास्तविकरूप से कार्यत्व ओर कारणत्व नहीं बन सकते तथापि साक्षी चेतन में का…
- Verse 23विचार (विचार से उत्पन्न आत्मसाक्षात्कार) भी अपने से उत्पन्न ओर परमार्थरूप से अपने से अभिन…
- Verses 24–25तब तो उक्त विचार या अन्तिम साक्षात्कारयवृक्ति मोक्ष मे भी अवशिष्ट रहेगी, उसका अन्य से ना…
- Verse 26इच्छादिरहित मन के शान्त होने पर कर्मेन्द्रिय आदि कर्म में, नहीं चलाये गये यन्त्रो की नाई,…
- Verse 27जैसे काठ की नाली के भीतर लकड़ी के बने हुए दो भेड़ों को परस्पर भिड़ाने में भीतर रक्खी हुई…
- Verses 28–35मन के चलने में निर्विषय स्वेदन हेतु नहीं हो सकता अतएव सविषय वेदन को मन के चलन का हेतु कहन…