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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verses 16–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verses 16–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 16-21

संस्कृत श्लोक

सर्वप्रमाणसत्तानां पदमब्धिरपामिव । प्रमाणमेकमेवेह प्रत्यक्षं तदतः शृणु ॥ १६ ॥ सर्वाक्षसारमध्यक्षं वेदनं विदुरुत्तमाः । नूनं तत्प्रतिपत्सिद्धं तत्प्रत्यक्षमुदाहृतम् ॥ १७ ॥ अनुभूतेर्वेदनस्य प्रतिपत्तेर्यथाभिधम् । प्रत्यक्षमिति नामेह कृतं जीवः स एव नः ॥ १८ ॥ स एव संवित्स पुमानहंताप्रत्ययात्मकः । स ययोदेति संवित्त्या सा पदार्थ इति स्मृता ॥ १९ ॥ ससंकल्पविकल्पाद्यैः कृतनानाक्रमभ्रमैः । जगत्तया स्फुरत्यम्बु तरङ्गादितया यथा ॥ २० ॥ प्रागकारणमेवाशु सर्गादौ सर्गलीलया । स्फुरित्वा कारणं भूतं प्रत्यक्षं स्वयमात्मनि ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रासंगिक बोधचंचु के लक्षण को कहकर प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के तत्त्व के परीक्षणपूर्वक जीवकी अद्वितीय कूटस्थ चिन्मात्रस्वभावता के व्युत्पादन द्वारा व्यवहार में भी जीवन्मुक्त पुरुष की मन्दराचलशून्य समुद्र के द्ृष्टान्त से लब्ध निष्क्रियताका समर्थन करने के लिए कहते हैं। जैसे सम्पूर्ण जलों का आधार समुद्र है, वैसे ही सम्पूर्ण प्रमाणों के प्रामाण्य का आधारभूत प्रत्यक्ष ही मुख्य तत्त्व है, इसलिए उस प्रत्यक्षको ही तत््वतः आपसे कहता हूँ, उसे सुनिये। जैसे सब प्रमाणों की सार इन्द्रियाँ हैं, वैसे ही सम्पूर्ण इन्द्रियों का सार अपरोक्षज्ञान है, ऐसा श्रेष्ठ लोगों का कहना है, वही (अपरोक्षज्ञान) मुख्य प्रत्यक्ष हे जो “घटमहं जानामि" इस त्रिपुटीज्ञान से सिद्ध जो अवच्छेदभूत, आश्रयभूत और विषयभूत वस्तु है, वह भी प्रत्यक्ष कही गई है । व्यवहारभूमि में अनुभूति, वेदन और प्रतिपत्तिका नामाक्षरों के अनुसार “प्रत्यक्ष यह नाम किया गया है, वह साक्षी ही प्राणधारण के कारण जीव कहा जाता है । साक्षी ही वृत्तिरूप उपाधि से संवित्‌ कहा जाता है। “अहम्‌ इत्याकारक प्रतीति का विषय वही प्रमाता कहा जाता है, वही साक्षी जिस विषयाकारकी वृत्ति से (बाह्याकारवृत्ति से) आवरणभंग होने पर, आविर्भूत होता है वह पदार्थ (विषय) कहा जाता है, इस प्रकार साक्षी ही क्रम से त्रिविधता को प्राप्त होता हे । जल जैसे तरंग आदि के रूप में प्रकाशित होता है, वैसे ही वही-परमात्मा नामक अद्वितीय, नित्य, सर्वव्यापक, सर्वावभासक चैतन्य ही-विविध भ्रमो को करनेवाले संकल्पविकल्पप्रधान अन्तःकरणों से जगत्‌ के रूप में प्रकाशित होता है । सृष्टि के पूर्व में वह साक्षी एक और अकारणरूप से विराजमान था, तदुपरान्त सृष्टि आरम्भ में सृष्टिलीलावश सृष्टिभाव को प्राप्त हुए उसने अपने स्वयं ही कारणभाव का आविर्भाव किया अर्थात्‌ आप ही अपना कारण हुआ