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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verses 7–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verses 7–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 7-11

संस्कृत श्लोक

दृष्टान्तैर्यत्नमाश्रित्य जेतव्यं परमे पदम् । विचारणवता भाव्यं शान्तिशास्त्रार्थशालिना ॥ ७ ॥ शास्त्रोपदेशसौजन्यप्रज्ञातज्ज्ञसमागमैः । अन्तरान्तरसंपन्नधर्मार्थोपार्जनक्रियः ॥ ८ ॥ तावद्विचारयेत्प्राज्ञो यावद्विश्रान्तिमात्मनि । संप्रयात्यपुनर्नाशां शान्तिं तुर्यपदाभिधाम् ॥ ९ ॥ तुर्यविश्रान्तियुक्तस्य प्रतीपस्य भवार्णवात् । जीवतोऽजीवतश्चैव गृहस्थस्य तथा यतेः ॥ १० ॥ न कृतेनाकृतेनार्थो न श्रुतिस्मृतिविभ्रमैः । निर्मन्दर इवाम्भोधिः स तिष्ठति यथास्थितम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार के दृष्टान्तो द्वारा बोधित, पुरुष को प्रयत्नपूर्वक परम पद प्राप्त करना चाहिए और शान्तिप्रद शास्त्रों के अर्थ का परिज्ञाता तथा विचारवान्‌ होना चाहिए। सत्‌-शास्त्रो के उपदेश, सज्जनता, बुद्धि, शास्त्रज्ञ ओर आत्मज्ञानियोके समागम से पूर्व पूर्वं अन्तरंग साधन क्रम से युक्त धर्मों (७७) गुरुसेवा आदि के उपयोगी धनों ओर शास्त्र के तात्पर्यविषयीभूत अर्थो के उपार्जनरूप कर्म में तत्पर बुद्धिमान्‌ पुरुष को तबतक विचार करना चाहिए जबतक कि पुनः नष्ट न होनेवाली चतुर्थपदनामक (८) (सप्तमभूमिकाप्राप्तिरूप) शान्तिमिय आत्मविश्रान्ति प्राप्त नहीं हो जाती । जो पुरुष सप्तमभूमिकाप्राप्तिरूप विश्रान्तिसुख से युक्त है ओर संसाररूपी समुद्र के पार हो चुका है, वह चाहे जीवित हो चाहे जीवनरहित हो, गृहस्थ हो या यति हो उसको एेहिक फल ओर पारलौकिक फल कृत या अकृत कर्म से प्राप्त नहीं होते ओर श्रवण-मननरूप मनके विक्षेपं से उसका कोई प्रयोजन नहीं है, वह मन्दराचलरूप मन्थनदण्ड से रहित समुद्र के समान स्वस्थ रहता हे