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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

मनस्यनीहिते शान्ते न प्रवर्तन्त एव ते । कर्मेन्द्रियाणि कर्मादावसंचारितयन्त्रवत् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

इच्छादिरहित मन के शान्त होने पर कर्मेन्द्रिय आदि कर्म में, नहीं चलाये गये यन्त्रो की नाई, प्रवृत्त नहीं होते। मनकी शान्ति होने पर कर्मेन्द्रियों के ओर उनकी प्रवृत्ति के निमित्त विषयस्फूर्ति के न होने से जीवमें चलन क्रिया का अभाव है, इस अभिप्राय से "निर्मन्दर इवाम्षोधि:” (मन्थनदण्डरूप मन्दराचल से शून्य समुद्र के समान) यह दृष्टान्त दिया हे । भाव यह कि अज्ञानियोँ की दृष्टि से चलनक्रिया का भान होने पर भी जीवन्मुक्तो की चलनक्रिया सिद्ध नहीं हो सकती