Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
एकांशेनोपमानानामुपमेयसधर्मता ।
बोद्धव्यं बोध्यबोधाय न स्थेयं बोधचञ्चुना ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह तो आप परस्पर विरुद्ध कहते है शृहस्थस्य तथा यतेः“ इससे तत्-तत् आश्रम में
नियत धर्मो में निष्ठ रहना चाहिए, ऐसा कहा, “न कृतेऽकृतेनार्थः“ इससे अनियतधर्मनिष्ठता
कही और (तत्र निर्मन्दर इवाऽर्णवः“ इससे आत्यन्तिक विक्षेपकी निवृत्ति का प्रतिपादक दृष्टान्त
दिया, ये सब कैसे संगत होंगे एसी शंका कर जो पहले आत्मतत्व के विषय मे एक अंश से
साम्य ग्रहण करना चाहिए, ऐसा कहा, उसीके अभिप्राय से इसका उदाहरण दिया गया है, ऐसा
कहते हैं।
किसी एक अंश से उपमानों की उपमेयों के साथ बोध्य पदार्थ के बोधन के लिए समता
होती है । बोध्य पदार्थ के बोध के उपयोगी होने के कारण इस बात पर अवश्य ध्यान देना
चाहिए कि दूसरे के पक्ष का खण्डन करने के लिए ही चोंच की नाईं तनिक बोध को मुँह में
लगाकर न बैठ जाना चाहिए, अपितु बोध को हृदय में प्रविष्ट करा देना चाहिए। अन्यथा
स्वपुरुषार्थ का विनाश अनिवार्य हो जायेगा