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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

स्थातव्यं नेह भोगेषु विवेकरहितात्मना । उपलोदरसंजातपरिपीनान्धभेकवत् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रकृत स्थल में उपयुक्त होने के कारण अनात्मविषयक दृष्टान्त दे रहे श्रीवस्रिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी को शान्ति आदि की प्राप्ति में प्रवृत्त करते हैं । विवेकशून्य बुद्धि वाले पुरुष को इस संसार में, पत्थर की चट्टान के बीच में उत्पन्न अत्यन्त मोटे अन्धे मेढक के समान भोगों मेँ आसक्त नहीं होना चाहिए, किन्तु शान्ति आदि के लाभ के लिए प्रयत्न करना चाहिए