Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verses 28–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verses 28–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 28-35
संस्कृत श्लोक
रूपालोकमनस्कारपदार्थव्याकुलं जगत् ।
विद्यते वेदनस्यान्तर्वातान्तः स्पन्दनं यथा ॥ २८ ॥
सर्वात्मवेदनं शुद्धं यथोदेति तदात्मकम् ।
भाति प्रसृतदिक्कालबाह्यान्तारूपदेहकम् ॥ २९ ॥
दृष्ट्वैव दृश्यताभासं स्वरूपं धारयन्स्थितः ।
स्वं यथा यत्र यद्रूपं प्रतिभाति तथैव तत् ॥ ३० ॥
स सर्वात्मा यथा यत्र समुल्लासमुपागतः ।
तिष्ठत्याशु तथा तत्र तद्रूप इव राजते ॥ ३१ ॥
सर्वात्मकतया द्रष्टुर्दृश्यत्वमिव युज्यते ।
दृश्यत्वं द्रष्टृसद्भावे दृश्यतापि न वास्तवी ॥ ३२ ॥
अकारणकमेवातो ब्रह्म सिद्धमिदं स्थितम् ।
प्रत्यक्षमेव निर्मातृ तस्यांशास्त्वनुमादयः ॥ ३३ ॥
स्वयत्नमात्रे यदुपासको यस्तद्दैवशब्दार्थमपास्य दूरे ।
शूरेण साधो पदमुत्तमं तत् स्वपौरुषेणैव हि लभ्यतेऽन्तः ॥ ३४ ॥
विचारयाचार्यपरम्पराणां मतेन सत्येन सितेन तावत् ।
यावद्विशुद्धं स्वयमेव बुद्धया ह्यनन्तरूपं परमभ्युपैषि ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के चलने में निर्विषय स्वेदन हेतु नहीं हो सकता अतएव सविषय वेदन को मन के
चलन का हेतु कहना होगा । ऐसी अवस्था में मनःस्पन्दन के पहले भी विषयों का अस्तित्व
मानना होगा तथा पहले आप विषयों को मनोमय कह चुके है अतः विषयसिद्धि से पहले मन
की सिद्धि कहनी होगी, यों अन्योन्याश्रय दोष होगा, ऐसी शंका कर सबके संस्काररूप से
मायाशबल चैतन्य के भीतर अधिष्ठान की सत्ता से स्थित होने के कारण सत् ही आविर्भुत
होता है, ऐसा कहते हैं।
जैसे स्पन्दन (चलन) वायु के ही अन्तर्गत है, वैसे ही रूप अवलोक, मनस्कार तथा
पदार्थ या विषय इनसे परिपूर्ण जगत् वेदन के (विषयस्फूर्ति के) अन्तर्गत है। (बाह्य इन्द्रियो के
द्वारा विषयग्रहण रूप अवलोक है एवं मन के द्वारा विषयानुसन्धान मनस्कार है) इन दोनों के
ही विषय पदार्थ हैं । शुद्ध सर्वात्मवेदन कर्मपरिपाक की व्यवस्था से प्राणियों के कर्मभोग के
लिए जैसे आविर्भूत होता है, उन्हीं का रूप धारणकर उत्पन्न हुआ-सा विस्तृत देश, काल,
बाह्य ओर आभ्यन्तर पदाथेकि स्वरूप से शोभित होता है। सर्वात्मरूप विचार देह आदि
दुश्यताभास को देखकर ही वही मेरा स्वरूप हे यों अज्ञान से समझता हुआ जीवभाव से स्थित
है । अपना रूप जहाँ, जैसे और जिस प्रकारका प्रतीत होता है वैसा ही वह हो जाता है । वह
सर्वात्मा जहाँ जैसे उल्लास को प्राप्त होता हे वहाँ शीघ्र वैसे ही स्थित होता हे ओर तद्रूप जैसा
शोभित होता है । हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे भरमवश रज्जु में सर्पज्ञान होता हे वैसे ही जगत् ओर
वह सर्वात्मा द्रष्टा मिथ्या दृश्य होकर प्रकाशित होते हैं, परन्तु जब विचार होने पर भ्रम निवृत्त
हो जाता है तब सम्पूर्ण दश्य यथार्थ है, ऐसा बोध नहीं होता । चूँकि चिद्रूपी द्रष्टा सर्वात्मक है
अतएव उसके दृश्य के तुल्य होना अयुक्त नहीं हे प्रत्युक्त युक्तिसिद्ध ही हे । द्रष्टा के स्वरूप
में ही दृश्यभाव का भान होता हे, अतएव दृश्यभाव वास्तविक नहीं है । इसलिए यह स्थित
प्रत्यक्ष ही अकारण अद्वितीय ब्रह्म सिद्ध हुआ अनुमान आदि प्रत्यक्षपूर्वक होने से उसके अंश
है । भाव यह कि सम्पूर्ण प्रमाणों का तत्त्व आत्मा ही हे । सिंहावलोकन न्याय से दैव के निरास
का स्मरण कराते हुए पौरुष का ही यह फल है । हे सज्जनशिरोमणि श्रीरामजी, परमार्थतः जो
केवल अपने पूर्वजन्म का कर्म है, उसे दैव मानकर “मैं उसके आधीन हूँ जैसा वह मुझसे
करायेगा वैसा करूँगा” यों उसकी उपासना में तत्पर जो पुरुष है उससे कल्पित देव को दूर
भगाकर इन्द्रिय आदिकी विजय में शूर अधिकारी पुरुष अपने पौरुष से ही उस परम पद को
अपने हृदय में ही प्राप्त करता है । हे श्रीरामचन्द्रजी जब तक आप स्वयं ही बुद्धि से उस
अनन्तरूप, विशुद्ध परब्रह्म का साक्षात्कार नहीं करते तब तक आचार्यपरम्परा के परमार्थनिष्ठ
और प्रमाणशुद्ध मत से विचार कीजिए