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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verses 14–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

हृदये संविदाकाशे विश्रान्तेऽनुभवात्मनि । वस्तुन्यनर्थं यः प्राह बोधचञ्चुः स उच्यते ॥ १४ ॥ अभिमानविकल्पांशैरज्ञो ज्ञप्तिं विकल्पयेत् । बोधं मलिनयत्यन्तः स्वं खमब्द इवामलम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

लक्षणों द्वारा दो प्रकार के बोधचंचुओं का निर्देश करते हैं । हृदयरूपी संविदाकाश में विश्रान्त अनुभवस्वरूप आत्मरूप वस्तु में जो अनर्थबुद्धि करता है, वह पहला बोधचंचु है, भाव यह है कि ज्ञान के फलको जो अनर्थरूप से समझे, वह पहला ठ दिने दिने च वेदान्तश्रवणाद्‌ भक्तिसंयुतात्‌ । गुरुशुश्रूषया युक्तात्‌ कृच्छाशीतिफलं लभेत्‌ ॥ यो यजेताऽश्वमेघेन मासि मासि शतं समाः । न यः क्रुध्येत सर्वस्य तयोरक्रोधनो वरः ॥ इत्यादि स्मृति में प्रसिद्ध धर्मो का। & "शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते“ इस श्रुति में चतुर्थपदनामक शान्ति सप्तमभूमिकाप्रतिष्ठा कही गई है । बोधचंचु है। जैसे निर्मल आकाश को मेघ मलिन कर देता है, वैसे ही अभिमानमूलक कुतर्को से ज्ञान और उसके साधनों को विकल्पित करता हुआ जो मूर्ख अपने आत्मभूत बोध को अन्तःकरण में मलिन करता है, वह द्वितीय बोधचंचु है