Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, Verses 24–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 19, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 24, 25
संस्कृत श्लोक
विचारवान्विचारोऽपि आत्मानमवगच्छति ।
यदा तदा निरुल्लेखं परमेवावशिष्यते ॥ २४ ॥
मनस्यनीहिते शान्ते स्वबुद्धीन्द्रियकर्मभिः ।
नहि कश्चित्कृतैरर्थो नाकृतैरप्यभावनात् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो उक्त विचार या अन्तिम साक्षात्कारयवृक्ति मोक्ष मे भी अवशिष्ट रहेगी, उसका
अन्य से नाश मानने में अनवस्था होगी, इस पर कहते है ।
जब विचारवान् पुरुष आत्माकार हो जाता है तब विचार भी निवृत्त हो जाता है, तब
निरुल्लेख (शब्द आदि का अविषय) एकमात्र ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता हे । इस प्रकार प्रपंच
के बाधित होने पर अपने बुद्धि, इन्द्रिय आदि के साथ इच्छा आदि से रहित मन के शान्त
(वृत्तिशून्य) होने पर कार्य, अकार्य, इच्छा आदिका कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, क्योकि
बाधित का सत्यरूप से भान न होने के कारण प्रारब्धजनित क्रियाभास से क्रिया ओर उसके
फल का भोग नहीं होता, यह भाव हे