Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 27
छल्बीसर्वौ सर्ग समाप्त ।
21 verse-groups
- Verses 1–3() "य आदित्ये तिष्ठन्“ इत्यादि श्रुति से अपने में अधीष्ठित ईश्वर से प्रेरित होनेवाला एवं…
- Verse 4वृद्धावस्था आक्रान्त, जिसमें अनेक पलितादि नये-नये फूल खिले हैं और अत्यन्त जीर्ण मनुष्यों…
- Verses 5–7इस लोक में तृष्णारूपी नदी निरन्तर बहती है, वह अपने प्रबल वेग से संसार के सम्पूर्ण अनन्त प…
- Verses 8–9मूलअज्ञान के उच्छेद द्वारा भलीभाँति तैर जाते हैं मगर ऐसा करना बड़ा कठिन है, क्योकि उसके उ…
- Verse 10कर्म ही देह, इन्द्रियरूपी सागर को तरने का उपाय है, ऐसी शंका पर कहते हैं। किसीकी कोई भी क्…
- Verse 11भाग्योदय हुए बिना कीर्ति, प्रताप, लक्ष्मी आदि छोटे-मोटे फल भी, धैर्य आदि के नाशक राग, लोभ…
- Verse 12भाग्योदय होने पर सव जगह अभीष्ट वस्तु प्राप्त हो जाती है, इसलिए पुरुष का प्रयत्न विफल है,…
- Verses 13–14पूज्यवर, भ्रान्तिवश पुत्र, स्तर्यो, धन आदि जो सम्पूर्णं रसायन के समान सुखसाधन समझे जाते ह…
- Verse 15मनुष्य जीवन के आरम्भ में कमाने की ओर भोगतृष्णा की प्रबलता से मोक्षमार्गका परित्याग कर केव…
- Verse 16जो लोग धर्मोपार्जन नहीं करते, उनके चित्त में भले ही शान्ति न हो; पर धर्मोपार्जन करनेवाले…
- Verses 17–22आसुरसम्पत्ति के विस्तारपूर्वक प्रदर्शन द्वारा पूर्वोक्त अर्थ को ही विशद करते हैं । ये कार…
- Verse 23भगवती श्रुति ने भी कहा है - असनन्नेव स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेत्” अर्थात् जो असत्…
- Verses 24–30जैसे चंचल भ्रमररूपी नयनां से युक्त (चंचल भ्रमरो से सेवित), लाल पत्तों से आच्छन्न विषवृक्ष…
- Verse 31संसार की दृष्टियों में ऐसी कौन दृष्टियाँ है, जिनमें दोष का सम्बन्ध नहीं है दिशाओं में कौन…
- Verses 32–34यदि शंका हो कि इस लोक के जनों के विनाशी होने पर भी ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए लोगों का, जो…
- Verse 35इसी प्रकार प्रकृति की दृष्टि में सम्पूर्ण विकार भी असत्य ही प्रतीत होते है। पर्वत वस्तुतः…
- Verse 36यदि भोगचमत्कार होता है, तो अभी क्यो विरक्त होते हो ? भोगो को भोगकर वृद्धावस्था में विरक्त…
- Verses 37–38आसक्ति होने पर केवल पुरुषार्थ की हानि ही नहीं होती, प्रत्युत महान् अनर्थ भी होता है, ऐसा…
- Verse 39यद्यपि कहीं धार्मिक पुरुष हैं, तथापि विवेकी पुरुष तो अति दुर्लभ हैं, ऐसा कहने के लिए दो प…
- Verse 40लोगों की दुर्गति को देखकर दुःखित हुए श्रीरामचन्द्रजी लोगों की दुरति मे कारणभूत देव की निं…
- Verse 41संसार की अभद्रताका प्रतिपादन कर उसका उपसंहार करते हुए उससे होनेवाली अपने चित्त की उद्विग्…